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KGF पुष्पा

कोरोना की तीसरी लहर के बाद सिनेमाघरों में रिलीज फिल्म ‘पुष्पा- द राइज पार्ट 1’ को दर्शकों ने बहुत पसंद किया। अब इसके अगले पार्ट ‘पुष्पा- द रूल- पार्ट 2’ की प्रतीक्षा की जा रही है। इसके अलावा ‘केजीएफ- चैप्टर 2’, ‘खुदा हाफिज चैप्टर 2- अग्नि परीक्षा’ रिलीज की कतार में हैं। रणबीर कपूर व आलिया भट्ट अभिनीत ट्रायोलाजी फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ का पहला भाग सितंबर में रिलीज होगा। कई हिस्सों में बनने वाली फिल्मों के पीछे फिल्मकारों की सोच, कलाकारों की चुनौतियों व ऐसी फिल्मों के बढ़ते चलन की वजहों की पड़ताल कर रही हैं [स्मिता श्रीवास्तव]

पिछले कुछ अर्से से हिंदी फिल्मों के बाक्स आफिस पर हिट होने के बाद उसकी सीक्वल या फ्रेंचाइज फिल्मों का चलन काफी बढ़ा है। अगर फिल्मों का कोई किरदार लोकप्रिय हुआ हो या उसे जानने की जिज्ञासा जगी हो तो कई बार फिल्मकार उस किरदार के इर्दगिर्द ही पूरी फिल्म बना डालते हैं। मिसाल के तौर पर फिल्म ‘बेबी’ में तापसी पन्नू के किरदार पर फिल्म ‘नाम शबाना’ बनी थी, वहीं विद्या बालन अभिनीत फिल्म ‘कहानी’ के किरदार पर ‘बाब बिस्वास’ बीते दिनों रिलीज हुई थी। सीक्वल और प्रीक्वल फिल्मों को लेकर कोई नियम नहीं है कि उसमें मूल कहानी को ही आगे बढ़ाएंगे। कई बार फिल्म की लोकप्रियता का फायदा उठाते हुए निर्माता फिल्म को सीक्वल या प्रीक्वल के तौर पर प्रचारित कर देते हैं। हालांकि उसका मूल कहानी से कोई संबंध नहीं होता या फिर यह संबंध कहानी को सिर्फ आधार देने के लिए होता है। यह चलन काफी समय से ला आ रहा है।

बिजनेस व दर्शकों के मिजाज के अनुरूप है कांसेप्ट:

एस एस राजामौली निर्देशित दो पार्ट में बनी फिल्म ‘बाहुबली’ की सफलता के बाद फिल्मों को दो हिस्सों में बनाने में फिल्ममेकर्स अधिक दिलचस्पी ले रहे हैं। इस बाबत ट्रेड एनालिस्ट अतुल मोहन कहते हैं, ‘दो हिस्सोें का कांसेप्ट नया है। इससे पहले फ्रेंचाइजी या सीक्वल बना करती थीं। फ्रेंचाइजी में सिर्फ टाइटल होता है, उसका मूल कहानी से कोई संबंध नहीं होता जैसे ‘धूम’, ‘मुन्ना भाई’ ‘गोलमाल’ सीरीज। इनमें सारी फिल्मों की कहानियां अलग थीं। फ्रेंचाइज में हिट फिल्म के टाइटल को ही आगे इस्तेमाल किया जाता है। सीक्वल में कहानी आगे बढ़ती है, जैसे ‘कोई मिल गया’, ‘कृष’ सीक्वल फिल्में हैं। उनमें वही कहानी आगे चलती है। अब समय भी बदल गया है। पहले फिल्में तीन से साढ़े तीन घंटे की हुआ करती थीं। ‘शोले’, ‘हम आपके हैं कौन’, ‘हम साथ साथ हैं’, ‘लगान’ या ‘गदर’, ये सब तीन घंटे से ऊपर की फिल्में थीं। अब लोगों का फिल्म देखने का पैटर्न भी बदल रहा है। उन्हें लंबी फिल्में नहीं देखनी हैं। फिल्में तीन घंटे से ज्यादा लंबी होती हैं तो मल्टीप्लेक्स में उनके शो कम होते हैं।[उससे आमदनी पर भी असर पड़ेगा।’]

उत्सुकता को जोड़ती कड़ियां:

अभी दो या सवा दो घंटे की फिल्में बनती हैं। अब दो पार्ट में भी कहानियां बन रही हैं। पहले पार्ट में आप ऐसी जगह कहानी को छोड़ते हैं, जहां से दूसरे हिस्से को लेकर जिज्ञासा और उत्सुकता रहती है। ‘पुष्पा- द राइज’ में पुष्पा डान बन गया है। अब क्या करेगा उस पर निगाहें हैं। राजामौली की फिल्म ‘बाहुबली’ के बाद फिल्म को दो हिस्सों में बनाने के चलन में तेजी आई। यद्यपि उससे पहले अनुराग कश्यप ने दो पार्ट में फिल्म ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ बनाई थी। इन कहानियों की खास बात है कि यह प्रचारित कर दिया जाता है कि फिल्म दो हिस्सों में बनेगी। ‘बाहुबली- द बिगनिंग’ के बाद लोगों में उत्सुकता थी कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? जिसका जवाब ‘बाहुबली- द कंक्लूजन’ में मिला था। आगामी दिनों में ‘पुष्पा- द रूल पार्ट 2, ‘केजीएफ चैप्टर 2’, ‘खुदा हाफिज- चैप्टर 2 अग्नि परीक्षा’ रिलीज होंगी, जिनमें कहानी का समापन हो जाएगा। अयान मुखर्जी ट्रायोलाजी फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ला रहे हैं। तीन हिस्सों में बनने वाली ‘ब्रह्मास्त्र’ का पहला पार्ट सितंबर में रिलीज होगा।

कहानी पर निर्भर करता है निर्णय:

फिल्म को दो हिस्सों में बनाने को लेकर राजामौली का कहना है कि ‘बाहुबली’ को मैंने दो हिस्सोंं में इसलिए बनाया था, क्योंकि उसकी कहानी बड़ी थी। मैं उसे एक फिल्म में फिट नहीं कर सकता था। मैं दर्शकों को साढ़े पांच घंटे की फिल्म देखने के लिए थिएटर नहीं बुला सकता था। यह प्रैक्टिकल बात नहीं होती। यही वजह है कि हमने उसे दो हिस्सों में बनाने का फैसला किया, जबकि ‘आरआरआर’ की कहानी सिर्फ एक फिल्म में ही फिट बैठती है। फिल्म को दो हिस्सों में बनाने के पीछे कोई ठोस वजह होनी चाहिए। अगर आपके पास बड़ी कहानी है तो ही उसे दो हिस्सों में बनाएं। अगर उससे बड़ी कहानी है तो उसे तीन हिस्सों में बनाएं। मार्केट फैसला नहीं करता है कि आप कितने पार्ट में फिल्म को बनाने वाले हैं।

सफलता बढ़ाती है आत्मविश्वास:

‘पुष्पा- द राइज’ के निर्देशक सुकुमार का कहना है कि फिल्म की सफलता ने फिल्मों को दो पार्ट में बनाने का कांफिडेंस दिया है। वह कहते हैं, ‘लाल चंदन लकड़ी की तस्करी सबसे ज्यादा आंध्र प्रदेश में होती है। इतनी बड़ी तस्करी दुनिया में कहीं नहीं होती। भारत के अलावा अफ्रीकी देशों में भी ये पेड़ होते हैं, लेकिन हमारे यहां पर इसे विशेष रूप से उगाया जाता है। जापान में इसकी बनी गुड़िया को घर में रखने को लोग बहुत शुभ मानते हैं। यह लकड़ी बेशकीमती होती है। एक टन लकड़ी की कीमत 3.5 करोड़ रुपये है। मैंने फिल्म बनाने से पहले इस विषय पर काफी रिसर्च की थी। कहानी लिखनी शुरू की तभी लग गया था कि फिल्म को एक पार्ट में नहीं कहा जा सकता है। इसलिए मैंने इसे दो पार्ट में बनाने का फैसला किया। यह कोई सीक्वल नहीं है। यह एक ही कहानी है। पुष्पा को लोग जान चुके हैं। उसके सरनेम को लेकर इमोशनल बैकड्राप है। उसमें कई खलनायक भी हैं। उनका भी जिक्र होना है। यह इमोशनल जर्नी होगी। दूसरे पार्ट पर काम शुरू हो चुका है।’

अत्यधिक समर्पण की दरकार:

दो पार्ट में बन रही फिल्में ज्यादातर साउथ फिल्म इंडस्ट्री में बन रही हैं। हिंदी सिनेमा में इस ओर कम झुकाव है। इस पर अतुल कहते हैं, ‘दो हिस्सों में फिल्म बनाने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। किसी एक फिल्म के लिए कई साल तक समर्पित रहना कलाकारों के लिए भी मुश्किल होता है। प्रभास ने ‘बाहुबली’ को पांच साल दिए। 18वीं सदी में सेट इस फिल्म में दो भाइयों के बीच सत्ता की लड़ाई है। प्रभास दो किरदार राजा अमरेंद्र बाहुबली और उनके बेटे की भूमिका में थे। प्रभास के मुताबिक, वार सीन के लिए मेरा वजन 99 किलो था, जबकि बेटे के किरदार के लिए मुझे वजन कम रखना था। 300दिनों की शूटिंग में 220 दिन महज एक्शन सीन की शूटिंग में गए। ‘बाहुबली’ जीवन में एक बार मिलने वाले अवसर की तरह थी। हालांकि अब किसी एक प्रोजेक्ट के लिए इतना वक्त निकालना मुश्किल है, क्योंकि करियर को आकार देने में उम्र महत्व रखती है।

‘बाहुबली’ ने दुनियाभर में सफलता की जो मिसाल पेश की, उससे भारतीय सिनेमा के प्रति धारणाएं परिवर्तित हुईं। दो हिस्सों में बनने वाली फिल्मों को दर्शकों की व्यापक रुचि को ध्यान में रखते हुए बनाया जा रहा है। ‘पुष्पा’ के अभिनेता अल्लू अर्जुन कहते हैं, ‘पूरी दुनिया में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री सबसे बड़ी है। भारतीय सिनेमा आगामी 10-15 साल में शिखर पर होगा।’ जरूरी है कि पहला पार्ट दिलचस्प हो ‘केजीएफ’ के अभिनेता यश कहते हैं, ‘फिल्म अगर दो घंटे तीस मिनट से बड़ी बन जाए तो दर्शक ऊब जाते हैं। दो हिस्सों वाली फिल्में एक कहानी से थोड़ा ज्यादा और दो कहानियों से थोड़ी कम होती हैं। ‘केजीएफ’ को दो हिस्सों में न बनाया जाता तो कहानी के साथ हम न्याय नहीं कर पाते। दो हिस्सों में फिल्में बनाना कई बार जोखिम भरा काम हो सकता है। संभव है कि कहानी का रोचक हिस्सादूसरे पार्ट में हो। पहले पार्ट के कई किरदारों को दूसरे पार्ट में विस्तार से दिखाया जाता है। ऐसे में पहले पार्ट का रोचक होना जरूरी है।’
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